देश के प्रत्येक शहर में प्रतिदिन कहीं न कहीं, कोई न कोई, धार्मिक सभा हो रही होती है। प्रत्येक धर्मोपदेशक के पास हजारों हजारों श्रोताओं की भीड़ दिखाई देती है। धर्मोपदेशक आकर्षक हावभाव से धार्मिक कथाएँ श्रवण करा रहे होते हैं। श्रोता भी भाव विभोर होकर कथा का रसास्वादन करते प्रतीत होते हैं। कथाओं के दौरान लोग नाचते गाते हर्षित और प्रफुल्लित दिखाई देते हैं।
यह एक आश्चर्या जनक तथ्य है की देश में हो रही सैकडों धर्मसभाओं में आध्यात्मिक गुरुओं द्वारा उद्बोधित प्रवचनों को दिन रात हजारों लोग सुनते हैं, फ़िर भी असहिष्णुता भ्रष्टाचारी , कालाबाजारी , बेईमानी , गरीबी, अलगाववाद, जातिवाद आदि हर दशहरे में रावण के कद की तरह बढते ही जा रही हैं। सहनशीलता का अभाव है। यह एक विचारणीय विषय है।
देश में जिस अनुपात में धर्मोन्माद देखने को मिलता है उसी अनुपात में अराजकता बढती जा रही है। हर एक धर्म सभाओं में हजारों हजारों की संख्या में लोगो को देखकर यह विचार आना स्वाभाविक है की जब इतने सारे धार्मिक लोग हैं तो देश में नैतिक ता का ज़ोर होना चाहिए, लोगों के व्यक्तित्व और कृतित्व में निखार आना चाहिए। पर क्या ऐसा है? पश्चिमी देशों में इस कदर धार्मिक सभाओं के दौर होते नही देखे जाते हैं। धर्मिक्क्ता का इतना उन्माद भी नही देखा जाता। फ़िर भी वहाँ पर लोग अपने अपने कामों के प्रति ईमानदार और जीवन के मूल्यों के प्रति सचेत देखे जाते हैं। वहाँ के लोग संतुष्ट दिखाई देते हैं। किंतु हमारे देश में धार्मिकता का प्रचुर ज्ञान प्रकाश होने पर भी क्रोध , अधैर्य असहनशीलता बढते ही जा रही हैं। अधिकतर कथा रसिक जो अपने वर्तमान से तो असंतुष्ट दिखाई देते हैं, अगले जनम जो अनिश्चित है, के लिए लालायित रहते हैं। इस जनम की , वर्तमान की तो क़द्र नही किंतु अगला जनम जो अज्ञात है को सुधारने के लिए चिंतित दिखाई देते हैं।
यह भी अध्ययन का एक रोचक विषय हो सकता है की "कथाएँ सुनने से लोगों को व्यक्तिगत या पारिवारिक रूप से क्या प्राप्ति होती है या समाज को वे इस तरह से क्या योगदान देते हैं? परिवार में बुजुर्गों की अवहेलना , उपेक्षा प्रताड़ना ईर्ष्या पाखण्ड में कहीं कोई कमी नही आती दिखाई देती। अनैतिकता , विखंडन आदि बढते जा रहें हैं। बहूएँ दहेज़ के नाम से प्रताडित हो रही हैं। कन्या भ्रूण हत्याएं बदस्तूर जारी हैं। लोग अपने ही प्रति अनुशासित और जवाबदेह नही हैं। अपने काम के प्रति भी इमानदार नहीं हैं। धर्मोपदेशकों की कथाओं से लोगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता नज़र नही आ रहा। और जो थोडा बहुत दिखाई भी देता है, वो क्षणिक ही होता है। जब तक चपड़ी आग के पास होती है, वह नरम रहती है। आग से दूर होने पर फ़िर सख्त या कठोर हो जाती है।
धर्म के नाम पर दंगा फसाद बढता ही जा रहा है। सम्प्रदाय बढ रहे हैं, उनका वर्चस्व बढता ही जा रहा है।
धार्मिक उपदेशों से लोगों की समझ विकसित होती दिखाई नही पड़ रही। आज समय की मांग है की मानव मनाव के प्रति स्नेहपूर्ण नही दिखाई देता।
कुछ लोगों का यह भी मानना है की 'धर्म सभाएं अत्तेंद करने के बाद लोग नकारत्मक काम निसंकोच हो कर करते हैं। शायद वे सोचते हैं की एक हाथ से पाप तो दूसरे से पुण्य अर्जित करके वे जीवन में संतुलन कायम रख सकते हैं। यह उनकी अपनी सोच का एक तरीका हो सकता है।
धर्म गुरु तो खिले हुए पुष्प की तरह होते हैं, जो सर्वत्र लगातार सुगंध ही बिखेरते हैं। वे तो समाज को सही दिशा और दशा दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। किंतु लोग ही उनके वचनों को हृदयंगम नही करते।, बस सुनना मात्र ही पुण्य समझते हैं। इसीलिए उनका जीवन फूल की तरह नही महकता । वचनों को सुनकर लोग अगर उस पर चिंतन मनन करे तो अच्छाई की सौंधी सौंधी महक से देश सुरभित हो जाएगा।

7 Comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

"कथाएँ सुनने से लोगों को व्यक्तिगत या पारिवारिक रूप से क्या प्राप्ति होती है या समाज को वे इस तरह से क्या योगदान देते हैं?
इस पर तो शोध हो ही जाना चाहिए।

परमजीत बाली said...

शायद स्वयं वही आचरण ना करना जो दूसरों को उपदेश देकर समझाया जाता है।उसी कारण से भगतजनों पर इन के प्रवचनों का प्रभाव नही पड़ता।

vandana said...

kathyein sunkar unka manan bhi jaroori hai sirf sunna kafi nhi hota.phir manan ke baad use aachran mein utarna bhi jaroori hota hai.isiliye logon par uska asar nhi hota kyunki wo jo sunte hain use wahin par chodkar aa jate hain agar kuch shabd ya koi ek hi baat bhi apne sath le aayein aur un par amal karna shur kar dein to jeevan apne aap badalne lage.

श्यामल सुमन said...

धर्म तो अब एक कारोबार है। जिसको जहाँ अवसर मिलता सभा लगाकर धनोपार्जन करते हैं। बात चिन्ता की तो अवश्य है।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

T.V. चैनलों के चलते कथाबाजी एक पूर धंधा बन चुकी है.

AlbelaKhatri.com said...

aapne antarman k andhkaar ko nanga karne ka mahti karya kiya hai
badhaai !

अर्चना गंगवार said...

बस सुनना मात्र ही पुण्य समझते हैं। इसीलिए उनका जीवन फूल की तरह नही महकता । वचनों को सुनकर लोग अगर उस पर चिंतन मनन करे तो अच्छाई की सौंधी सौंधी महक से देश सुरभित हो जाएगा

satya vachan.....vijay ji.....

mere khayal se jo log khud se bhagte hai...satya se bhagte hai....vo in updesho ki chav mein hi baithe nazer aate hai.....kyoki inme jayadater wahi hote hai jo kahi na kahi apni zimmedari se bhagte hai.......

isme media ka bahut bara role hai .....jo logo ka waqt berbaaad kera rahi hai....

thanks for sharing