खुशनुमा लम्हों को कैसे ग्रहण लगा दिया तुमने
खिलखिलाती मसर्तों को कैसे तनहा बना दिया तुमने
तुम्हे तो सब कुछ था पता क्या कुछ हैं होने वाला
कुछ न बताया राज़ अपना बेनूर छोड़ दिया तुमने
हम तो लाये थे जलती मशालों की लौ ढूँढकर
कर डाला अँधेरा मशालों को बुझा दिया तुमने
मौसम की तरह रंग बदलते रहे तुम बार बार
जब भी जानना चाहा चेहरा लगा दिया तुमने
तुम्हारा हर गुनाह छुपा लिया दोस्त बनकर
कहें किससे, हमारी वफ़ा का अच्छा सिला दिया तुमने

6 Comments:

दिगम्बर नासवा said...

हम तो लाये थे जलती मशालों की लौ ढूँढकर
कर डाला अँधेरा मशालों को बुझा दिया तुमने

वाह रवि जी सुन्दर लिखा है......KUCH दोस्त तो होते ही ऐसे हैं...

ओम आर्य said...

sahee hai bejabaan banaa diyaa tumane.....aisee shaayari kari ki diwana kahane ko machal utha.....waah waah waah

RAJNISH PARIHAR said...

मौसम की तरह रंग बदलते रहे......!प्यार में ऐसे नहीं होता...प्यार तो समर्पण का दूसरा नाम है...!अच्छी रचना के लिए बधाई...

mehek said...

मौसम की तरह रंग बदलते रहे तुम बार बार
जब भी जानना चाहा चेहरा लगा दिया तुमने
तुम्हारा हर गुनाह छुपा लिया दोस्त बनकर
कहें किससे, हमारी वफ़ा का अच्छा सिला दिया तुमने
waah kya gehre jazbaat bayan kiye hai,bahut sunder.

विनय said...

रवि जी बहुत ख़ूब

vandana said...

bahut hi dardbhari rachna.