नम है पलके और उसमे छुपी हुई है एक कहानी,
दिल खुद कैसे ये दास्तान अपनी है जुबानी.
एक प्यारा सा ख्वाब था उसमे थी एक परी अंजानी,
दिखाये ख्वाब हज़ार पर वो तो थी बेगानी.

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वो सुनना ही नही चाहते थे,
और हम इज़्हार करते रहे.
वो आना ही नही चाहते थे,
और हम इन्तेज़ार करते रहे.
खता उनकी नही हमारी है की,
हम एक पत्थर दिल से प्यार करते रहे।

7 Comments:

गिरिजेश राव said...

पहली तो बहुत पसन्द आई।
लेकिन दूसरी?
माफ करिएगा। अब पत्थर दिल से प्यार और खता वगैरह बहुत पुराने हो चुके हैं और घिस चुके हैं। कविता के भाव भी कई रचनाओं में कमोबेश ऐसे ही प्रस्तुत किए जा चुके हैं। इससे बचा जा सकता था।

ओम आर्य said...

वो सुनना ही नही चाहते थे,
और हम इज़्हार करते रहे.
वो आना ही नही चाहते थे,
और हम इन्तेज़ार करते रहे.
खता उनकी नही हमारी है की,
हम एक पत्थर दिल से प्यार करते रहे।

KOEE AISE HI PATHAR DIL NAHI HOTA HAI KOEE TO MAJBOORI RAHI HOGI.......BAHUT HI KHUBSOORAT RACHANA......BADHAI

मोहिन्दर कुमार said...

सुन्दर लिखा है आपने..
एक शेर याद आ गया आपकी रचना पढ कर

जिन्हें हम कह नहीं सकते
जिन्हें तुम सुन नहीं सकते
वही कहने की बातें हैं
वही सुनने की बाते हैं

नीरज गोस्वामी said...

रवि जी दोनों रचनाएँ बहुत सुन्दर हैं..लाजवाब.
नीरज

Ravi Srivastava said...

Girijesh ji, …लेकिन मुझे भी माफ करिएगा… “…प्यार और खता वगैरह बहुत पुराने हो चुके हैं और घिस चुके हैं…” मैं आप के इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं हूँ. क्योकि चाहे भले ही अब तक लाखों, करोडों लोगों ने प्यार किया हो, तो भी प्यार कभी पुराना नहीं हुआ है. वह तो आज भी उतना ही तरोताजा और जिंदादिल है..... ज़रुरत है तो बस उसे महसूस करने की. और यदि अगर प्यार में नयापन अब भी मौजूद है तो फिर उससे सम्बंधित विचार, साहित्य और रचनाएं कैसे पुरानी हो गयीं.

आप मेरे ब्लॉग पर आये और एक उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया दिया…. शुक्रिया.
आशा है आप इसी तरह सदैव स्नेह बनाएं रखेगें….

गिरिजेश राव said...

अरे भाई, ये तो बात का बतंगड़ हो गया। मेरी असहमति भावनाओं से नहीं उनकी प्रस्तुति के पुराने और अति प्रचलित ढंग पर थी।
मेरा स्पष्टीकरण स्वीकारें बन्धु!

संगीता पुरी said...

सुंदर रचना !!