कभी दुःख की आंच किसी पे न आने देना
आया हैं मेहमान कोई तो न जाने देना।
हर घडी खुद से उलझ जाती हूँ मैं
अगर कोई मनाये तो मनाने देना।
मैं जो अक्सर तन्हाई में रो पड़ती हूँ
किस्सा-ए-गम सुनाऊं तो सुनाने देना,
उसने भेजा हैं यह पैगाम बाजूर
हवा जुल्फ तुम्हारी लहराए तो लहराने देना।
हर बात का मतलब गलत न निकला करो
जब मैं समझाऊँ तो समझाने देना।

एक ग़ज़ल उसपे लिखूँ दिलका तकाज़ा हैं बहोत,
इन् दिनों खुदसे बिछड़ जाने का धड़का हैं बहोत।
रात हो दिन हो गफलत हो कि बेदारी हो,
उसको देखा तो नहीं हैं उसे सोचा हैं बहोत।
मेरे हाथों कि लकीरों के इजाफे हैं गवाह,
मैंने पत्थर की तरह खुदको तराशा हैं बहोत।

With Spl.Thanks to Vibha

1 Comments:

chandrabhan bhardwaj said...

har subah achchhi lagi har sham bhi achchhi lagi;
aapse parichaya hua to Zindagi achchhi lagi.

ek arasaa ho gaya tha muskarahat ke bine,
sher parha kar aapke aayee hansee achchhi lagi.

kya pata yah umra ka tha ya ki mausam ka asar,
chandani to chandani ab dhoop bhi achchhi lagi.