दुनिया से अलग हमने मयखाने का डर देखा
मयखाने का डर देखा, अल्लाह का घर देखा।
दोनों के मज़े लुटे, दोनों का असर देखा।
अल्लाह का घर देखा, मयखाने का डर देखा।
काबे में नज़र आए जो सुबह अजान देते,
मयखाने में रातो को उनका भी गुज़र देखा।
कुछ काम नही मय से गो इश्क है इस सय से,
है रिंद 'रियाज़' ऐसे दामन भी न तर देखा।
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मरना तो इस जहाँ में कोई हादसा नही,
इस दूर-ऐ-नफरत में जीना कमाल है।

1 Comments:

RAJNISH PARIHAR said...

बहुत..खूब.............