कहने को उससे मेरा कोई वास्ता नही,
ऐ दिल मगर वो शख्स मुझे भूलता नही ।
डरता हूँ आँख खोलूँ तो मंज़र बदल ना जाये,
मैं जाग तो रहा हूँ मगर जागता नही।


अशफ्तगी से उसकी उसे बेवफा ना जान,
आदत की बात और है दिल का बुरा नही ।
तनहा उदास चाँद को समझो ना बेखबर,
हर बात सुन रहा है मगर बोलता नही ।


खामोश रतजगों का धुंआ था बाहर से,
निकला कब आफताब मुझे तो पता नही।
वो आंखें झील सी गहरी तो हैं मगर,
उनमें कोई भी अक्स मेरे नाम का नही

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बनोगे दोस्त मेरे तुम भी दुश्मनों एक दिन,
मेरे हयात की आह-ओ-फुगाँ सुनो तो सही।
लबों को सी के जो बैठे है बज्म-ऐ-दुनिया में,
कभी तो उनकी खामोशियाँ सुनो तो सही ॥

1 Comments:

vandana said...

khamoshi ki aawaz sirf khamoshiyan suna karti hain.........bahut hi bhavuk aur dil ko choo jane wali rachna likhihai.
har shabd mein chupi khamoshi dil par dastak deti hai.

maine bhi khamoshi par likha tha .....kabhi padhiyega mere zindagi blog par.