देश में सरकार अरबों रुपए खर्च करने के बाद भी गरीबी मिटा नहीं पाई है। गरीबी को मिटाने के लिए आजादी के बाद से अब तक 61 वर्षों में सरकार ने कम से कम 35 बड़ी एवं महत्वपूर्ण योजनाएं शुरू की और उस पर अरबों रुपए खर्च किए, लेकिन गरीबी घटने की बजाय बढ़ती जा रही है।इतना ही नहीं इन विषमताओं ने आतंकवाद, नक्सलवाद और साम्प्रदायिकता जैसी समस्याओं के लिए आग में घी का काम किया है।1952 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने गरीबी को दूर करने के लिए पहली महत्वपूर्ण योजना ‘सामुदायिक विकास कार्यक्रम’ शुरू किया था, उसके बाद से लेकर अब तक 35 महत्वपूर्ण एवं बड़ी परियोजनाएं शुरू की गई हैं।

नवीनतम सरकारी आंकड़ों के अनुसार अभी भी 26 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। जबकि जेएनयू की प्रसिद्ध अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक के अनुसार गरीबी बढ़ी है। गरीबी मिटने का दर मात्र 0।82 प्रतिशत है यानी इसकी गति इतनी धीमी है कि गरीबी मिटाने का संयुक्त राष्ट्र का लक्ष्य निर्धारित समय पर पूरा होना असंभव दिखता है। भारत में 44.2 प्रतिशत लोगों की प्रतिदिन की आय एक अमेरिकी डॉलर से भी कम है, जबकि पाकिस्तान में 31 प्रतिशत, बांग्लादेश में 36 प्रतिशत, नेपाल में 37.7 प्रतिशत और श्रीलंका में मात्र 6.6 प्रतिशत लोगों की इतनी आय है, यानी भारत की स्थिति इन सभी देशों में खराब है। एक ओर जहां देश की अर्थव्यवस्था करीब नौ प्रतिशत की तेज रफ्तार से आगे बढ रही है वहीं देश की करीब एक तिहाई आबादी प्रतिदिन 12 रूपये पर गुजारा करने को मजबूर है तथा करीब दो प्रतिशत परिवारों को भूखे पेट सोना पडता है।

वित्त मंत्री पी चिंदबरम द्वारा संसद में आज पेश 2007- 08 आर्थिक समीक्षा में जहां प्रति व्यक्ति औसत आय इस साल 29 हजार 786 रूपये सालाना रहने का अनुमान व्यक्त किया गया है वहीं 2004-05 के आंकडों के अनुसार तीस प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने पर मजबूर है। उसकी सालाना आय मात्र 4380 रुपये है जिनमें उडीसा और छत्तीसगढ की आधा से ज्यादा ग्रामीण आबादी गरीबी की रेखा से नीचे जीवन- बसर कर रही है। उडीसा की सर्वाधिक 57 प्रतिशत और छत्तीसगढ की 55 प्रतिशत ग्रामीण आबादी 12 रूपये प्रतिदिन यानी 365 रूपये मासिक आय पर गुजारा करने को मजबूर है। मध्यप्रदेश की 47 प्रतिशत तथा बिहार और झारखंड की 46 प्रतिशत ग्रामीण आबादी 365 रूपये मासिक आय पर जीवन यापन कर रही है जबकि बिहार की 55 प्रतिशत और उडीसा की 50 प्रतिशत शहरी आबादी प्रतिदिन 19 रूपये यानी 580 रूपये प्रतिमाह पर गुजारा कर रही है।

देश के 1।9 प्रतिशत परिवारों को भरपेट भोजन भी नसीब नहीं है जिनमें उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में ऐसे लोगों की संख्या सर्वाधिक है।

गरीबी मापने का सरकारी पैमाना यह रहा कि व्यक्ति को प्रतिदिन 2400 कैलोरी मिलनी चाहिए, लेकिन 1993-94 से लेकर 2004-05 के बीच गरीबी बढ़ी हैं क्योंकि 2200 कैलोरी प्रतिदिन पानेवाली ग्रामीण जनता की संख्या 58।5 प्रतिशत से बढ़कर 69.5 प्रतिशत हुई है। दूसरी तरफ योजना आयोग के विशेष समुह की वर्ष 2008 की रिर्पोट के अनुसार भारतीय समाज में जिस तरह क्षेत्रीय एवं सामाजिक असंतुलन की चुनौतियां बढ़ रही हैं उससे उग्रवाद, आतंकवाद, तथा साम्प्रदायिकता जैसी समस्याएं भी पैदा हो रही है।

भारतीय योग गुरू स्‍वामी रामदेव पिछले दिनों अमेरिका की यात्रा पर पहली बार पहुंचे, यहां उन्‍हें गरीबी उन्‍मूलन कार्यक्रम में भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया था। भारत की तरह अमेरिका में भी उनके प्रशंसकों की बड़ी संख्‍या है। गरीबी उन्मूलन के विषय में स्वामी जी का संदेश बहुत साफ था कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जिम्मेदारी समझ कर, देश के हित में कार्य करना चाहिए।

आर्थिक असमानता से सामाजिक तनाव, शहरों में असंतोष, गांवों में हताशा, युवकों में मोहभंग, बेरोजगारी, भुखमरी और अनाज की कमी आदि पैदा हो रही है।
With Spl.Thanks to josh18

4 Comments:

COMMON MAN said...

kaun kahta hai ki garibi nahi miti, netaon ki, afsaron ki, doctoron ki, wakeelon ki, lalaon ki, udyogpation ki miti ya nahi

COMMON MAN said...
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BrijmohanShrivastava said...

प्रिय श्रीवास्तव जी / बहुत तलाशता था की कही आपको पढूं /ब्लॉग में कुछ समझ में न आया /आपकी कमेन्ट जो कृपा कर आपने दी थी मेरे ब्लॉग पर , यहाँ आने का पता मिल गया / यह लेख पढ़ा / आख़िर इस मर्ज़ की दवा क्या है कौन बतायेगा की गरीबी कैसे मिटे और औसत आय कैसे बढे / मैं तो अब आपकी कविता ""तेरी खुशी के लिए "" पर जारहा हूँ

Adams Kevin said...

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