भूख से बिलखते बच्चे को देख
उन्होँने उदारता दिखाई
एक मानव कल्याण समिति बनाई
और
भूख पर विस्तृत चर्चा कराई
ठण्ड से ठिठुरते, दांत किटकिटाते
वस्त्रहीन बच्चे की नग्नता पर
भी उन्होँने गोष्ठी आयोजित कराई
और
नैतिकता की आवश्यकता समझाई
गरीब, असहाय बीमार बच्चे की
रुग्णावस्था पर
उन्होँने बहुत चिंता जताई
और
इसे स्वस्थ्य के प्रति घोर लापरवाही बताई,
बेसहारा, बेघरबार बच्चे की
दयनीय स्थिति पर आख़िर
उनकी आँख नम हो आई
और
उन्होँने भारी हृदय से उसकी पीठ थपथपाई
और अखबारों मे अपनी फोटो खिंचाई।
प्रशंशनीय है उनकी दयालुता और उदारता,
पर
वो निरीह मासूम बच्चा पहले से भी
ज्यादा भूखा, ठिठुरता, निराश्रित अभी भी
खडा है राह मे सूनी आँखों से निहारता।

2 Comments:

वन्दना said...

bahut hi badhiya kataksh..........is par to jyada kahne ki himmat hi nhi....aapne sab kah diya.

राकेश 'सोहम' said...

सच के करीब कविता 'दयालुता और उदारता' के लिए बधाई नीचे लिखी मेरी इन पग्तियों के साथ स्वीकारें -

वे
भरी सभा में
मंहगाई, बेरोजगारी
हटाने की बात तो
कह गए सीनातानकर,
पर
भ्रष्टाचार
हटाने की बात
ना ला सके जुबान पर !!
[] राकेश 'सोहम'