है इस दिल को तुझसे शिकवे और शिकायत भी बहुत
सनम मेरे फिर भी है मुझको तुमसे मोहब्बत बहुत
हर घडी रहता है तस्स्वुर मे तू ही
ए मोहब्बत मेरे तेरी इतनी इनायत ही है बहुत
हर पल तन्हाईयाँ ही साथ थी कभी
दिल-ए-मेहफिल मे अब तेरी इतनी मौजुदगी ही है बहुत
कभी आ जाते है लब पे ये बोल हो जाऊ दुर तुझसे
इस दिल को मगर तेरी ज़रूरत भी है बहुत
जुदाई भी तेरी ही देखी है और रंग़-ए-मेहफिल भी
तेरे दिल मे बसा मेरे प्यार का एक नुर ही है बहुत
जब पी ही ली है ज़हर-ए-मोहब्बत तो अब क्या
कभी सुना था की इस ज़हर मे होती है लेज़्ज़त बहुत
हर खुशी और गम से नवाजा है खुदा ने मुझे
जानू तेरी बाहो मे फना होने की एक तम्मना है बहुत

3 Comments:

पी.सी.गोदियाल said...

जब पी ही ली है ज़हर-ए-मोहब्बत तो अब क्या
कभी सुना था की इस ज़हर मे होती है लेज़्ज़त बहुत
हर खुशी और गम से नवाजा है खुदा ने मुझे
जानू तेरी बाहो मे फना होने की एक तम्मना है बहुत
लाजबाब पंक्तियाँ !

दिगम्बर नासवा said...

हर खुशी और गम से नवाजा है खुदा ने मुझे
जानू तेरी बाहो मे फना होने की एक तम्मना है बहुत.

kurbaan is tamanna par ..... bahut hi khoobsoorat panktiyan hain .... lajawaab ..

राकेश 'सोहम' said...

जुदाई भी तेरी ही देखी है और रंग़-ए-मेहफिल भी
तेरे दिल मे बसा मेरे प्यार का एक नुर ही है बहुत

उक्त पंग्तियों में विरोधाभास सा है, फिर भी सम्पूर्णता में कविता अच्छी है .
[] राकेश 'सोहम'