अतीत के झरोखों से
जब भी मैं
झांकता हूँ
तो पाता हूँ
की एक व्यर्थ की
आपाधापी में
किया तो बहुत कुछ
पर
पहुंचा कहीं नहीं
दौड़ - धूप भी
बहुत कर ली
पर पहुंचा कहीं नहीं
कोल्हू के बैल
की तरह
परिधि पर ही
व्यर्थ घूमता रहा
तमन्नाओं को
तराशने मे लगा रहा
उम्मीदों के बहाव मे
बहता रहा
फ़िर भी
मकाँ मकाँ ही रहा
घर बन नही पाया
रिश्तों का उपवन
मुरझाता गया
मधुबन बन नही पाया
उम्र का बोझ ढ़ोते ढ़ोते
ठोकरें खाते खाते
जीवन का तो अंत आया
पर
हसरतों का फ़िर भी मुकाम ना पाया।

5 Comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

बहुत खूबसूरत विचार।
हसरतें अगर मुकाम पा जाएं, तो फिर वे हसरत ही न रहें।
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सांसद/विधायक की बात की तनख्वाह लेते हैं?
अंधविश्वास से जूझे बिना नारीवाद कैसे सफल होगा ?

praneykelekh said...

kafi achi rachna hai

Pandit Kishore Ji said...

bahut hi achhe vicharo waali rachna

अर्चना गंगवार said...

जीवन का तो अंत आया
पर
हसरतों का फ़िर भी मुकाम ना पाया।

vijay ji....
hasrato ka apna role hota hai .....
vo hoti hai tu chalne ka josh banta hai .....jaise bina petrol car nahi chal sakti na....
hasrato ek sarak hoti hai jis per insaan chal ker kuch pata hai.....
aur ager hasrat pori na ho tu ...?
shayad us per pora vishwas nahi kiya gaya......?

Vandana ! ! ! said...

antim do line to bahut hi achhci hai.. shayad yehi wo chiz hai zindagi ko gatiyamaan banaye rakhti hai...