अब
कह तो चुके हैं
सब कुछ,
फ़िर ये मन
अनमना सा
क्यों है ?


हम
चल तो चुके हैं
उजाले की ओर,
फ़िर ये अँधेरा
घना सा
क्यों है ?

रह तो
रहे हैं साथ
कब से,
फ़िर ये भ्रम
बना सा
क्यों है ?

सब
उठा तो चुके हैं
सितम ज़माने के,
फ़िर ये खंज़र
तना सा
क्यों है ??
[] राकेश 'सोहम'

3 Comments:

अनिल कान्त : said...

अच्छा लगा रचना को पढ़कर

अर्चना गंगवार said...

सब
उठा तो चुके हैं
सितम ज़माने के,
फ़िर ये खंज़र
तना सा
क्यों है ?

bahut achcha.........

वन्दना said...

waah ........bahut hi sundar bhav aur alfaz.