अस्तित्व के नाकाम होते संघर्ष में
जिंदगी भी कर्वेटेही बदलती रही
फूल काँटों में भी मुस्कुराता रहा
जिंदगी सेज पर भी सिसकती रही
पत्थरों के शहर में दम घुटता ही रहा
जिंदगी भी बेबस तमाशा ही देखती रही
समय की तेज़ आंच में मैं भी पिघलता रहा
और जिंदगी भी हाथों से फिसलती ही रही
मैं फ़िर भी चिरागे तमन्ना जलाता ही रहा
जिंदगी भी चिरागे तमन्ना बुझातीही रही
यूँ कशमकश का दौर तो चलता ही रहा
मैं जिंदगी को तो जिंदगी मुझे आजमाती रही।

3 Comments:

दिगम्बर नासवा said...

SACH KAHA JAB INSAAN NAAKAAM HOTA HAI...JINDAGI MAZAAK LAGNE LAGTI HAI.... BAHOOT HI LAJAWAAB LIKHA HAI... JEEVAN KE PAHLOO KO UJAAGAR KARTI RACHNA....

अर्चना तिवारी said...

अस्तित्व के नाकाम होते संघर्ष में
जिंदगी भी कर्वेटेही बदलती रही
फूल काँटों में भी मुस्कुराता रहा
जिंदगी सेज पर भी सिसकती रही

बेहतरीन रचना..

अर्चना गंगवार said...

मैं फ़िर भी चिरागे तमन्ना जलाता ही रहा
जिंदगी भी चिरागे तमन्ना बुझातीही रही
यूँ कशमकश का दौर तो चलता ही रहा
मैं जिंदगी को तो जिंदगी मुझे आजमाती रही।

bahut khoob .....
is kashmash mein hi zindagi ka anand hai