ऐसा क्यो होता है
सुख तो धुंए सा क्षण भर मे ही उड़ जाताहै
दुःख चिंगारी सा हमेशा सुलगता ही रहता है
ऐसा क्यो होता है

आशा तो बिजली की रेखा सी क्षणिक ही कौंधती है
निराशा अंधेरे सी सदा ही मन को घेरे ही रहती है
ऐसा क्यो होता है

हंसना भोर की लाली सा पल मे ही विदा हो जाता है
रोना जेठ की दुपहरी सा देर तक डटाही रहता है

ऐसा क्यो होता है

किनारे तक पहुंचतेही कभी किश्ती
किसी पत्थर सी डूब जाती है
कभी तुफानो से टकराती हुई भी
फूल सी किनारे लग जाती है

ऐसा क्यो होता है

कभी कोई करीब होकर भी सितारे सा
बहुत दूर लगता है
कोई दूर होकर भी मीठी याद सा
दिल के करीब रहता है

ऐसा क्यो होता है

कभी तो शब्द किसी के अमृत सरीखे
मरते को भी जिला देते हैं
कहीं मौन भी किसी का मुखर हो
ज़हर सा जीते जी मार देता है

ऐसा क्यो होता है

प्रिये से मिलन सदा फूलो की सेज सा
मन को गुदगुदाता है
और बिछुड़ना हमेशा ही काँटों सा
तन मन मे गड़जाता है

ऐसा क्यो होता है

कभी तो कोई रौशनी मे भी
कहीं भटक भटक जाता है
तो कभी कोई अंधेरे मे भी
मंजिल तक पहुँच जाता है

ऐसा क्यो होता है

जीवन कभी दर्द तो कभी दुआ बन जाता है
ऐसा क्यो होता है ऐसा क्यो होता है

2 Comments:

अल्पना वर्मा said...

कभी तो शब्द किसी के अमृत सरीखे
मरते को भी जिला देते हैं
कहीं मौन भी किसी का मुखर हो
ज़हर सा जीते जी मार देता है

-वाह!
बहुत खूब!
अच्छी है कविता

वन्दना said...

sach kaha hai-----------hum chahate hain aisa na ho magar hota haijo hona hota hai aur hum yahi sochte rah jate hain ki aisa kyun hota hai............in jazbaton ko bahu hi khoobi se ukera hai aapne apni kavita mein.........badhayi