यह सच है की
हर ज़न्मदिन
खुशिया तो लाता है
पर क्या जीवन को कुछ
दूर नही ले जाता है?
या
शायद मृत्यु को कुछ पास
ले आता है
क्योंकि सच तो ये है की
उम्र का
एक वर्ष कम हो ही जाता है
हम इस विचार से
हमेशा बचते हैं
जाने क्यों सच से डरते हैं
वास्तविकता से हट-ते हैं
भ्रमो मे ही जीते हैं
आशाओं के मरूध्यानोमे ही
भटकते रहते हैं

स्वर्णिम दिवास्वप्नों मे
ही उलझे रहते हैं
चार दिन की जिंदगी मे
दो दिन तो
आकांक्षाओं मे बीतते हैं
और बचे दो दिन
उन की पूर्ति की प्रतीक्षा
मे कटते हैं
अंत मे बस खाली
हाथ ही रहते हैं।

2 Comments:

दिगम्बर नासवा said...

अच्छी सोच है .......... लाजवाब लिखा है ..........

अर्चना गंगवार said...

और बचे दो दिन
उन की पूर्ति की प्रतीक्षा
मे कटते हैं
अंत मे बस खाली
हाथ ही रहते
aapki her rachna ....hakikat se parichay kervati hai.....

bahut achcha laga perker