तुमने चाहा ही नही हालात बदल सकते थे...
तेरे आँसू मेरी आँखों से निकल सकते थे..
तुम तो ठहरे रहे झील के पानी की तरह..
दरिया बनते तो बहुत दूर निकल सकते थे...



इश्क मुझको नही वहशत ही सही
मेरी वहशत तेरी शोहरत ही सही
हम भी दुश्मन तो नही हैं अपने
गैर को तुझ से मोहब्बत ही सही


हम कोई तर्क-ऐ-वफ़ा करते हैं
न सही इश्क मुसीबत ही सही ॥



कभी यूँ भी आ मेरी आँखों में
के मेरी नज़र को ख़बर न हो ,,
तुझे भूलने की दुआ करूँ,,
तो दुआ में मेरी असर न हो ।



मिला वो भी नही करते , मिला हम भी नही करते
वफ़ा वो भी नही करते , वफ़ा हम भी नही करते...
उन्हें रुसवाई का दुःख , हमे तन्हाई का डर,
गिला वो भी नही करते, शिकवा हम भी नही करते..
किसी मोड़ पर टकराव हो जाता है अक्सर,
रुका वो भी नही करते , ठहरा हम भी नही करते॥

With Spl.Thanks to Archana

3 Comments:

mehek said...

waah lajawaab

मोहन वशिष्‍ठ said...

तुमने चाहा ही नही हालात बदल सकते थे...
तेरे आँसू मेरी आँखों से निकल सकते थे..
तुम तो ठहरे रहे झील के पानी की तरह..
दरिया बनते तो बहुत दूर निकल सकते थे...

बेहतरीन बहुत ही अच्‍छे शेर लिखे हैं आपने

प्रकाश बादल said...

वाह बढ़िया रचना।