हमेशा मुस्कुरा के आंसूओं को छुपाया,
गम को छुपाने का यही रास्ता नज़र आया।

किस- किस को बताते बहते अश्कों का सबब,
कि दर्द-ऐ-दिल दिल में किस ने जगाया।

महफिलों में कहीं भी मज़ा न रहा,
रखा दिल पे पत्थर तो ख़ुद को सजाया।

बात बे बात अपनी आहें दबा कर,
यारों के दरमियाँ किस कदर मुस्कुराया।

न थी चाह कभी मुझे मंकाशी की,
जाम-ऐ-वफ़ा किसी भी वफ़ा ने पिलाया।

क्या मुक़दर से शिकवा करते रहें,
जो किस्मत में था वोही कुछ तो पाया।

यह किस मोड़ पे आ गई हैं उमीदें,
के साया-ऐ-मंजिल नज़र में न आया।

अपनों ने पलट के देखा तक नहीं,
गैरों ने आकर गले से लगाया।

अच्छा हुआ कि राज़ खुल ही गया,
दिल-ऐ-नादान पे खंजर किस ने चलाया।

शब्-ओ-रोज़ चाहत का सिला ये है शाकी,
दिल के टुकड़े हुए, और वो चुनने न आया।

1 Comments:

Amit K. Sagar said...

बहुत-बहुत शुर्किया एक उम्दा रचना पढाने के लिए. मज़ा आ गया यारा. जारी रहें.