क्यूँ बात हमारी नही मानते
क्यूँ दिल हमारा दुखाते हो
ये कोमल कोमल जज्बे मेरे
क्यूँ इन को सुलाते हो।

आँखों में रहती है नमी मेरे
क्यूँ इनसे आंखें चुराते हो
क्या रखा है बातों में मेरी
क्यूँ इन पे दिल लुटाते हो।

मान जाओ न बात हमारी
क्यूँ हम पे सितम ढाते हो
जो बात दिल में है तुम्हारे
वही दिल में है हमारे।

क्यूँ इन जज्बों को रुलाते हो
ये कोमल कोमल जज्बे मेरे
आख़िर क्यूँ इन को सुलाते हो।
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खुदा किसी को किसी पे फ़िदा न करे,
करे तो क़यामत तक जुदा न करे,
माना कि कोई मरता नही जुदाई में,
लेकिन जिंदा भी कहाँ रह जाता है।

2 Comments:

Amit K. Sagar said...

क्या रखा है बातों में मेरी
क्यूँ इन पे दिल लुटाते हो।
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मुझे यह बात समझ में नहीं आई बॉस...वाकी रचना बहुत अच्छी. जारी रहें.

Palak said...

जिन्दगी मै कभी कोई आए ना रब्बा
आए तो फ़िर जाए ना रब्बा
देने हो गर मुझे बाद मै असू
तो पहले कोई हसाए ना रब्बा....