पत्रों से
अब दिल
बहलाया नहीं जा सकता ।

प्यार भरी पाती
भावों का संगम
जीवन का
परिणय संवाद अब
झुठलाया नहीं जा सकता ।

कोमल भावनाओं की महक,
हर शब्द में
मिलन की कसक ।

प्यार की सौगातों की
लम्बी कथा,
कह गई पाती
सारी व्यथा ।

प्यार के उपहार में
शब्दों के जाल में, मैं
जब-जब भटक जाता हूँ;
सच कहूं
क्या करू
कुछ समझ नहीं पाता हूँ !
[] राकेश 'सोहम'

2 Comments:

फ़िरदौस ख़ान said...

बहुत खूब... शानदार रचना...

दिगम्बर नासवा said...

BAHOOT KHOOB LIKHA HAI ....