पत्थरों का सीना चीरकर
जिंदगी के झरोखे से झाँकती
एक शिशु सुकोमल मन
जीवन के भावी संघर्ष से अनजान
पत्थरों के बीच से
एक रोज बाहर निकला
चेहरे पर हरा-भरा इतना
ख़ुशी यूँ पर्वत को हरा दिया
मन में उमंग लिए
छूने को आसमान
सितारों के बीच पहचान
बनाने की सिद्दत से जिद्द.
तभी सुनाई पड़ीं कुछ आवाजें
तभी सहसा एक धमाका
नन्ही जिंदगी सहम गयी
कुछ सोच न पाया क्या हुआ
चारों ओर बस धुल ही धुल
निश्चल पत्थर डोल गए
जिस आसमान की चाहत थी
उसी ने फिर बरसाए अंगारे
झुलस गया सुकोमल तन
झेल गया घायल मन
वह वितीर्ण वेदना की पीड़ा
इस पर्वत में भी शायद आज
लग गया सभ्यता का कीड़ा

3 Comments:

सतीश सक्सेना said...

शुभकामनायें !!

रचना गौड़ ’भारती’ said...

बहुत सुन्दर वेदना जितनी प्रशंसा करें कम है। मेरे ब्लोग पर भी आकर देखें। बधाई।

दिगम्बर नासवा said...

शशक्त लिखा है .......... इंसान की हवस क्या कुछ और करवाएगी सभ्यता के नाम पर ...