मेरे कमरे की खिड़की से

रोज़ सुबह

मुस्कुराता हुआ आता है

सूरज

मेरे सारे क्रिया कलापों का

गवाह बनता है

सूरज

मेरे जीवन की कशमकश और

ज़द्दोज़हद को

बड़ी शिद्दत से देखता है

सूरज

कहता कुछ नहीं, बस

मूक दर्शक बना रहता है

सूरज

और शाम को जाते हुए

रोज़ मेरी उम्र का एक दिन

साथ ले जाता है

सूरज

5 Comments:

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा!

वन्दना said...

behtreen.

संजय भास्कर said...

कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
बहुत सुन्दर रचना । आभार
ढेर सारी शुभकामनायें.

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

अर्चना गंगवार said...

bahut hi khoobsorti se ahesaas ko share kiya hai......

sunder

संजय भास्कर said...

bahut hi khoobsorat