एक तीन साल का बालक मास्टर राज के नन्हें- नन्हें हाथों से कोरे कागज़ पर उकेरे गए बचपने से बालचित्रों को देखकर आप को क्या महसूस होता है? बच्चे का मन एक सादे कागज़ की तरह ही कोरा होता है। उसके द्वारा बनाए गए हर चित्र एक अलग ही कहानी कहते हैं। कल मैंने जब इन चित्रों को देखा तो एक पल के लिए मुझे मेरा बचपन याद आ गया। वैसे तो देखने में ये चित्र कुछ ख़ास नही मालूम पड़ते हों, लेकिन मास्टर राज की आँखों से देखने पर ये चित्र भी कुछ बोलते हुए से जान पड़ते हैं।

मास्टर राज एक चित्र की और इशारा करते हुए कहता है कि यह मेरी बहन साक्षी है जो अकेली है और मुझे अपने साथ खेलने के लिए बुला रही है। साक्षी इस समय राज के साथ नही रहती है। वह दो महीने से अपनी नानी के घर रह रही है। अब राज के साथ खेलने वाला कोई नही। इसलिए अब उसका मन नही लगता।

एक दूसरे चित्र में वह बताता है कि यह एक माली है जो एक हाथ से टब से पानी निकालकर दूसरे हाथ से गर्मी और धूप के कारण सूखते हुए पौधों को पानी दे रहा है ताकि उन्हें कुछ राहत महसूस हो। एक जगह वह कहता है कि मुझे बहूत भूख लगी है और मै कूकर में खाना पका रहा हूँ और साक्षी मेरी हेल्प कर रही है।

एक कोने में ख़ुद के द्वारा बनाए हुए चित्र को दिखाकर मास्टर राज कहते हैं कि यह एक आर्मी है जो विलन के जहाज पर बम फेक रहा है। अन्यत्र एक छोटा बच्चा बनाता है जो हाथ में बन्दूक लिए हुए है, पूछने पर कि यह कौन है… वह कहता है, "यह मै ही हूँ"।


3 Comments:

Udan Tashtari said...

बाल मन है..नाजुक होता है एवं पाक साफ!! वही कागज पर उतर गया है.

अनिल कान्त : said...

bachche man ke sachche ....bahut achche chitra hain

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

सागर नाहर said...

बच्चों की रचनात्मकता भी कमाल की होती है।
हम भी बचपन में इस तरह की ड्राईंग बहुत बनाते थे, धड़ की जगह दो लकीरें,उनसे जुड़े दो हाथ और दो पाँव! दोनों पावं में तीन तीन अंगुलियाँ। :)