दरिया तो है वो, जिस से किनारे छलक  उठाये



बहते हुए पानी को मै दरिया नही कहता


गहराई जो दी तुने मेरे ज़ख्म ए जिगर को


मै इतना समुंद्र को भी गहरा नही कहता




किस किस की तम्मना मे करू प्यार को तक़सीम


हर शक़स को मै जान ए तम्मना नही कहता


करता हूँ मै, अपने गुनाहो पे बहुत नाज़


इंसान हूँ मै खुद को फरिश्ता नही कहता


5 Comments:

विकास said...

पत्रिका पर आ कर बहुत अच्छा लगा. आज पहली बार आया हूं अब कोशिश रहेगी बार-बार आने की.
रचना अच्छी थी. बहुत अच्छी नहीं कह सकता सो माफ करीएगा!!

Shekhar kumawat said...

wow achi rachan he
aap ko badhai



shekhar kumawat


http://kavyawani.blogspot.com/

"KaushiK" said...

गहराई जो दी तुने मेरे ज़ख्म ए जिगर को


मै इतना समुंद्र को भी गहरा नही कहता

saral shabdon men kafi gahri baat kahi hai....

Suman said...

nice

संजय भास्कर said...

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।