Showing posts with label कविता. Show all posts
Showing posts with label कविता. Show all posts

मैं तुम पे
मोहित हो रहा हूँ ।

आँखों में
बालों में
और तुम्हारे गालों में,
आलोकित हो रहा हूँ ।

बोली में
ठिठोली में
माथे की रोली में,
शोभित हो रहा हूँ ।

आवों में
हवा में
इस बिखरी छटा में,
तिरोहित हो रहा हूँ !

०००० [] राकेश 'सोहम'


अब
कह तो चुके हैं
सब कुछ,
फ़िर ये मन
अनमना सा
क्यों है ?


हम
चल तो चुके हैं
उजाले की ओर,
फ़िर ये अँधेरा
घना सा
क्यों है ?

रह तो
रहे हैं साथ
कब से,
फ़िर ये भ्रम
बना सा
क्यों है ?

सब
उठा तो चुके हैं
सितम ज़माने के,
फ़िर ये खंज़र
तना सा
क्यों है ??
[] राकेश 'सोहम'
इस पड़ाव पर
मन के मरुथल में
तुम्हारी चाहत के
कमल खिल गए हैं ।

सोचता हूँ
छीन लूँगा तुम्हें
इस जमाने से ।

लेकिन
जब भी
ऐसा सोचता हूँ,
बाँहें
पूरे योवन से
फडफडा उठातीं हैं
मुट्ठियाँ
सख्त हो जातीं हैं
और .......

और
उनमें दबा
साहस
सरकने लगता है !
सरकता ही जाता है
भुरभुरी
रेत की तरह !!
[] राकेश 'सोहम'
एक रात
अनमनी सी
मचलती रही
जुल्फों की छाँव में

कहने को
क्या हुआ,
तन-मन को
जब छुआ !

एक बात
अजनबी से
हवा हो गई
पनघट की ठांव में !
० राकेश 'सोहम'