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मैं तुम पेमोहित हो रहा हूँ । आँखों में बालों में और तुम्हारे गालों में, आलोकित हो रहा हूँ । बोली में ठिठोली में माथे की रोली में, शोभित हो रहा हूँ । आवों में हवा में इस बिखरी छटा में, तिरोहित हो रहा हूँ !०००० [] राकेश 'सोहम'

अब
कह तो चुके हैं
सब कुछ,
फ़िर ये मन
अनमना सा
क्यों है ?
हम
चल तो चुके हैं
उजाले की ओर,
फ़िर ये अँधेरा
घना सा
क्यों है ?
रह तो
रहे हैं साथ
कब से,
फ़िर ये भ्रम
बना सा
क्यों है ?
सब
उठा तो चुके हैं
सितम ज़माने के,
फ़िर ये खंज़र
तना सा
क्यों है ??
[] राकेश 'सोहम'
इस पड़ाव पर
मन के मरुथल में
तुम्हारी चाहत के
कमल खिल गए हैं ।
सोचता हूँ
छीन लूँगा तुम्हें
इस जमाने से ।
लेकिन
जब भी
ऐसा सोचता हूँ,
बाँहें
पूरे योवन से
फडफडा उठातीं हैं
मुट्ठियाँ
सख्त हो जातीं हैं
और .......
और
उनमें दबा
साहस
सरकने लगता है !
सरकता ही जाता है
भुरभुरी
रेत की तरह !!
[] राकेश 'सोहम'
एक रातअनमनी सीमचलती रहीजुल्फों की छाँव मेंकहने कोक्या हुआ,तन-मन कोजब छुआ !एक बातअजनबी सेहवा हो गईपनघट की ठांव में !० राकेश 'सोहम'